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धनबाद के बाघमारा में अतिक्रमण पर सरकार सख्त, आठ सितंबर तक हटेगी चाहरदीवारी; MLA सरयू राय ने उठाया मामला_我的网站

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一 |     राज्य ब्यूरो, रांची। धनबाद जिले के बाघमारा क्षेत्र के मौजा दरिदा और लेड़िडुमर में अवैध अतिक्रमण को हटाने के लिए झारखंड सरकार ने ठोस कदम उठाने का एलान किया है। जमशेदपुर पश्चिमी के विधायक सरयू राय द्वारा विधानसभा में उठाए गए गैर सरकारी संकल्प के जवाब में राजस्व, निबंधन एवं भूमि सुधार विभाग के मंत्री दीपक बिरुआ ने सदन को आश्वस्त किया कि आठ सितंबर तक अतिक्रमित भूमि को मुक्त कराया जाएगा।,बाघमारा के अंचल निरीक्षक द्वारा पूर्व में दिए गए प्रतिवेदन के अनुसार, मौजा दरिदा में ढुलू महतो और उनके समर्थकों ने न केवल निजी जमीनों, बल्कि सरकारी जमीन और सार्वजनिक रास्तों पर भी अवैध कब्जा किया है।,इस अतिक्रमण में कुल 92 प्लाट शामिल हैं, जिनमें आदिवासी, गैर-आदिवासी और मुस्लिम समुदाय के रैयतों की जमीनें प्रभावित हैं। प्रभावित रैयतों में मोहन मांझी, सोनाराम मांझी, बिरजू मांझी, मकरू मियां, जमीरुद्दीन अंसारी, गफूर मियां, सलीम मियां, गोधरा कुमार, पांचु महतो, रसिक मियां, मुस्लिम मियां, आबिद हुसैन, गफूर मांझी, लालू मंडल, मोहरी मांझी, यूनुस मियां, चितु मांझी, बाबूजान अंसारी आदि शामिल हैं।,मंत्री दीपक बिरुआ ने विधानसभा में बताया कि अतिक्रमण वाद संख्या-7/2024-25 के तहत अतिक्रमित भूमि को मुक्त करने का आदेश पारित किया गया है। बाघमारा अंचल कार्यालय ने इस कार्रवाई के लिए आठ सितंबर की तारीख निर्धारित की है। कार्रवाई पूरी होने के बाद अंतिम प्रतिवेदन प्रस्तुत किया जाएगा, जिसमें अतिक्रमण हटाने की प्रक्रिया का विवरण होगा। मंत्री ने आश्वस्त किया कि सरकार इस मामले में पूरी तरह गंभीर है और निर्धारित समय सीमा में अतिक्रमण हटाने की प्रक्रिया पूरी कर ली जाएगी।,सरयू राय ने चेतावनी दी है कि यदि निर्धारित तारीख तक कार्रवाई नहीं हुई तो वे धनबाद के शीर्ष प्रशासनिक अधिकारियों के खिलाफ विधानसभा में अवमानना का मामला दर्ज कराएंगे। सरयू राय ने सरकार के आश्वासन का स्वागत करते हुए सख्त रुख अपनाया। उन्होंने कहा कि यह स्पष्ट हो गया है कि सरकार आठ सितंबर तक अतिक्रमण के लिए खड़ी की गई चाहरदीवारी को तोड़ देगी। यदि ऐसा नहीं हुआ तो मैं बाघमारा के अंचल अधिकारी, धनबाद के अनुमंडल अधिकारी और उपायुक्त के खिलाफ विधानसभा में अवमानना का मामला दर्ज कराऊंगा।,उन्होंने कहा कि अतिक्रमण हटाना केवल कानूनी कार्रवाई नहीं, बल्कि प्रभावित समुदायों को उनका हक दिलाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम होगा।。    डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। देशभक्ति जगाने का काम जो संघ में कर रहे हैं, वह सारे समाज में हो। ऐसा बहुत लोग बिना किसी लाभ के कर रहे हैं। धर्म को जीने वाले गांव-गांव, शहरों की झुग्गी-झोपडि़यों में भी मिलेंगे। यह सारा जो भारत का बल है, बिखरा है। उसे एक रचना में बांधना है। कोई व्यक्ति, कुटुंब अछूता न रहे. ऐसा कार्य विस्तार करना पड़ेगा।,एक-एक गांव, एक-एक गली, एक-एक घर तक। समाज के सब वर्गों में, सब स्तरों तक। ऐसे संगठन का जाल उत्पन्न करना पहला काम है। यह सज्ज्न शक्ति जो बिखरी पड़ी है, उनको संपर्कित करना। उन्हें संघ में नहीं लाना, सिर्फ नेटवर्किंग बनाना है।,हम प्रयास करेंगे कि समाज के ऐसे सभी गर्वों को चलाने वाले, आपेनियियम मेकर में परस्पर नित्य संबंध बना रहे। वह अपने संबंधित वर्ग की उन्नति के लिए काम करें। लेकिन साथ ही यह अहसास हो कि हम इस समाज के अंग हैं। यह समाज रहेगा तो हमारा अस्तित्व रहेगा। सब लोग मिलकर काम करेंगे तो समस्या का निरसन और अभाव की पूर्ति कैसे हो, तय कर सकेंगे।,कोई दुर्बल वर्ग है तो उसकी मदद करें। यह समाज के स्वभाव में आ जाए, सहज स्वाभाविक प्रक्रिया बन जाए, इसका प्रयास हम लोग करेंगे। भारत के अधिकांश पड़ोसी देश पहले कभी भारत ही थे। लोग वही हैं, भूगोल, नदियां, जंगल वही है। बस नक्शे पर रेखाएं खींची गई हैं।,पहला कर्तव्य है कि ये जो अपने ही हैं, वह अपनत्व की भावना से जुड़ जाएं। देश अलग-अलग रहेंगे, लेकिन विरासत में मिले मूल्यों के आधार पर इन सभी की प्रगति हो। सबसे बड़ा भारत है, इसलिए उसको काम करना होगा। इससे जो संबंध बनेंगे, वह विश्व के लिए उपकारक होंगे। उस दृष्टि से क्या करना होगा, इस पर स्वयंसेवक विचार कर रहे हैं।,हमारा विचार है कि संगठित विचारशक्ति के आधार के समाज का परिवर्तन हो। बदलाव लाने वाले कुछ काम हमने शुरू किए हैं। अब हम स्वयंसेवकों के घरों के आधार पर अड़ोस-पड़ोस के समाज को उसमें सहभागी करना चाहते हैं। उन पांच कामों को हम पंच परिवर्तन कहते हैं। सामाजिक पापों, संस्कारहीनता, संबंधों की अज्ञानता के कारण जो होता है, उसको ठीक करने के लिए कुटुम्ब प्रबोधन। विशेषकर नई पीढ़ी का माइंडसेट इंडीविज्यूल बनता जा रहा है।,पहला, परिवार के सभी सदस्यों को सप्ताह में एक बार साथ बैठना चाहिए। भजन करें, भोजन करें, आपस में गपशप करें। बच्चे इस चर्चा में प्रश्न पूछेंगे, इसलिए अपनी तैयारी रखें। तीसरी बात है कि मैं और मेरा परिवार जिस समाज व राष्ट्र के कारण हैं, उसके लिए क्या कर सकते हैं, इस पर विचार करें। जब ऐसे काम बच्चे करने लेंगे तो संबंधों का महत्व समझ आएगा। दूसरा है पर्यावरण। नीतिगत बातें बदलने में बहुत समय लगेगा।,लेकिन अपने जीवन में बदलाव के लिए छोटे काम कर सकते हैं। जैसे कि पानी बचाओ, ¨सगल यूज प्लास्टिक हटाओ और पेड़ लगाओ। तीसरा सामाजिक समरसता है। यह करने में कठिन है, लेकिन करनी ही होगी। विषमता मनुष्य के मन में है। इसको मन से जाना चाहिए। इसके लिए कुछ व्यवहार करना पड़ेगा। जिस इलाके में हम रहते हैँ, आते-जाते हैँ, वहां अपने व्यक्तगत मित्र होने चाहिए। कुटुम्ब में मित्रता होनी चाहिए।,आज शुरू करो, तीन-चार साल में सब बन जाएगा। सबको करना पड़ेगा। जिस तरह मंदिर, पानी, श्मशान में कोई भेद नहीं होता। चौथा आत्मनिर्भरता है। इसे अपने घर से शुरू करें। जब स्वदेशी की बात करते हैं तो लगता है कि विदेशों से संबंध नहीं रहेंगे। ऐसा नहीं है। अंतरराष्ट्रीय व्यापार तो होगा, लेकिन इसमें दबाव नहीं, स्वेच्छा होना चाहिए। इसलिए स्वदेशी का पालन करना है। अपने घर की चौखट के अंदर अपनी भाषा और अपनी वेशभूषा चाहिए।,भाषा, भूषा, भजन, भोजन अपने घर के अंदर अपना, अपनी परंपरा का चाहिए। जहां आवश्यक है, अपनी भाषा के शब्द प्रयोग करो।पांचवां है हर हालत में संविधान, नियम, कानून का पालन करके चलना। कोई भड़काऊ बात हो गई तो भी कानून हाथ में नहीं लेना। थोड़ा सा आंदोलन करना पड़े तो करो। उपद्रवकारी लोग इसका लाभ लेते हैं, हमको तोड़ते हैं। अपना बिल समय पर भरें, लाइसेंस आदि समय पर नवीनीकृत कराएं। दैनिक जीवन में यही देशभक्ति है।,आज देश के लिए चौबीस घंटे जीने की आवश्यकता है। इसी तरह छोटी-छोटी बातों का ध्यान रखना होगा। यह सोचें कि मुझसे, मेरे घर से शुरू होगा तो देश में जाएगा, तब दुनिया को भारत में दिखेगा। इन सभी पर विचार चल रहा है। निर्णय प्रतिनिधि सभा में होना है, लेकिन इनमें से पंच परिर्वतन तो होना ही होना है। दुनिया अपनेपन से चलती है, सौदे से नहीं चल सकती। यह करना है तो इक्के-दुक्के का काम नहीं, एक पूरा राष्ट्र इसमें लगना चाहिए।,सृष्टि में विविधता है, परस्पर विरोध भी है। लेकिन यह विविधता एकता का ही आविष्कार है, लेकिन सबको, मानना और संभाल कर चलना, सब सुखी हों। हमारी विचारधारा में यही है। अपने देश में परंपरागत रूप से ही इतने वर्ग हैं। बाहर से भी वर्ग आए हैं, विशेष कर धार्मिक वर्ग है। बाहर से आक्रमण के नाते विचारधाराएं आईं, लेकिन किसी कारण उनको जिन्होंने स्वीकार किया, वह तो यहीं के हैं और आज यहीं हैं। भले ही विचारधारा विदेशी रहे, लेकिन हिंदू विचार तो वसुधैध कुटुम्बकम है। हर विचार को अच्छा मानता है।,जो दूरियां बनी हैं, उन्हें पाटने के लिए दोनों तरफ से कुछ करने की आवश्यकता है। वह होने के लिए संवाद बने, परस्पर अविश्वास को पाटकर निशंक होकर सब एक राष्ट्र के अंग के नाते अपनी विविधता के बावजूद आगे बढ़ें। उसके लिए भी हम संभल-संभल कर कदम बढ़ाने की बात कर रहे हैं। ऐसा विचार कर रहे हैं। स्थानीय स्तर पर ऐसे प्रतिमान बन रहे हैं, लेकिन उसके आधार पर राष्ट्रीय स्तर पर ऐसा चिंतन बनाना है। मनुष्य को धर्म के लिए त्याग करना होता है और धर्म की रक्षा करने से सबकी रक्षा होती है।,विविधता को समाप्त किए बिना चलती है। विश्व इसे भूल गया है। 300-350 वर्षों के पहले से जो धीरे-धीरे जड़वाद और व्यक्तिवाद अति पर पहुंच गया। इससे बने जीवन में भद्रता, संस्कार नहीं रहा। आज विश्व के देशों में यही स्थिति है। दुनिया में अशांति और कलह है, कट्टरपन बढ़ गया है। जीवन में किसी प्रकार की भद्रता, किसी प्रकार का संस्कार न हो, ऐसी इच्छा रखने वाले लोग वो इस कट्टरता का प्रचार करते हैं। यह बहुत संकट है सभी देशों पर, अगली पीढ़ी पर।,अधूरी दृष्टि से चल रही दुनिया को 180 डिग्री से अपने आउटलुक को बदलना होगा। वह आउटलुक है धर्म। धर्म रिलीजन नहीं है, पूजा-पाठ, खानपान से परे है। रिलीजन आन द टाप आफ रिलीजन है धर्म। उसमें विविधता का स्वीकार्य है। धर्म संतुलन सिखाता है। वह किसी अतिवाद पर नहीं जाने देता। अपने जीवन को धार्मिक जीवन बनाकर सारी दुनिया को देने की आवयकता है। आज की दुनिया संबंधों को तरस रही है। धर्म विश्व की इन समस्याओं का समाधान देता है।,शांति, पर्यावरण, उदारता को धर्म ²ष्टि को जानना पड़ेगा। धर्म यूनिवर्सल है, जैसे कि गुरुत्वाकर्षण। इसलिए यह विश्व धर्म है। इसे दुनिया को देने के लिए हिंदू समाज संगठित होना होगा। इसका मतलब धर्मांतरण नहीं है, धर्म में कन्वर्जन नहीं होता। भारतवर्ष की लाइफ मिशन ऐसा माडल खड़ा करना है, जिसका अनुकरण विश्व कर सके। व्यक्ति जीवन से लेकर पर्यावरण तक कैसा रास्ता हो, यह दिखाने के लिए भारत के समाज को अपना उदाहरण प्रस्तुत करना होगा। यह विचार संघ में पहले से था, लेकिन कोई सुनता नहीं। आज भारत की और संघ की स्थिति है कि पूरा समाज सुनता है।आज सभी बारी-बारी से आकर संघ को देखिए, संघ को समझिए।。

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Published on:10:06:03


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